Monday, 22 January 2018


बसंत





पुरवाई संग सुर मिलाते, अनेकों तान औ राग,
झूम- झूमकर खेतों में, सरसों खेले फाग, 
नटखट, पगली सी हवा देखो थिरक रही हर ओर,
थाम रही उसको, कैसे देखो, मतवारी पतंग की डोर,
किरणों की रेशमी चादर ओढ़े, सूरज मंद मंद मुस्कुरा रहा,
गुलाबी, पीला, लाल दुशाला ओढ़े इतरा रही कैसे धरा!
सजा है बेहिसाब रंगों का खेला,
सपनों की दुनिया का मेला,
टेसू का परचम लहराया,
हरा नीम भी गदराया,
मोती सम,चमकते, नन्हे, आम के बौर,
तितली रंग-बिरंगी,फिरती, कभी इस ठौर, कभी उस ठौर,
कहीं पेड़ से लिपटी लता ऐंठती,
कहीं नव किसलय दल में से, कोयल है कूकती,
मदहोश सा ये पवन बावरा,
आँख-मिचौली खेलता, बादल साँवरा,
धधके गुलाबी सी आग,
मोह, प्रेम और अनुराग,
अठखेलियाँ करता ये दिल बार-बार,
प्रेम रंग समेटे बेशुमार,
रेशमी सपनों की फिर दुनिया सजी है,
देखो, धरती फिर बसंत से सजी है।।
©®मधुमिता

Monday, 8 January 2018

सितारे टंके आसमां के नीचे..



सितारे टंके आसमां के नीचे, 
संग उनके झिलमिलाते, 
हम और तुम, 
तुम और हम, 
दूर कहीँ इस जहाँ से,
सपनों के हसीं जहाँ मे,
एक दूसरे में सिमटे,
इक दूजे की बाहों मे लिपटे, 
ख़ामोशी चहुँओर है,
बस साँसों का शोर है,
धड़कनें, धड़कनों को सुन पाती हैं,
तेरी हाज़िरी मे, मै कहीं खो जाती हूँ,
दो लब चूमते,
कभी सहलाते,
थोड़ा बहकाते,
ज़रा फुसलाते,
हम शरमाते,
तुम मुस्कुराते,
शोलों से जलते दो बदन,
कुछ ऐंठन, कुछ चुभन,
खेलते सितारों संग आँखमिचौली,
हम दोनो हमजोली,
तुम हममें 
और हम तुममें,
खो कर इक दूजे में,
हो गये एक दूजे के,
सितारे टंके आसमां के नीचे, 
संग उनके झिलमिलाते ।।

©®मधुमिता


Monday, 1 January 2018

नया साल




देखता क्यों है यूँ अचरज से
इन सजी-धजी अट्टालिकाओं को,
रंग-बिरंगे मुखौटो में सजे
नकली से इन चेहरों को,
कान क्यों थक रहे हैं तेरे
सुनकर, कोई झूठी हंसी, 
खिलखिलाते भ्रम देख ना!
देख लुभावने धोखे भी,
 ये तेज़ दौड़ती मोटर गाड़ियाँ 
और चौंधियाती रोशनी उनकी,
देख ना! कितने सपने सजाती है,
कुछ नशीली धुनें ,
कहीं धुन नशे की,
जिस्मों को थिरकाती है, 
किसी नये जहाँ ले जाती है,
नया साल है बे!
चल उठ ले,
फटे पर एक पैबंद लगा ले,
चल तू भी ज़रा मुस्कुरा ले,
झूठा ही सही,
पर तू भी ज़रा सा जी जा रे,
आजा नये साल को मना ले।।😊😊

©®मधुमिता

Sunday, 31 December 2017

ऐ 2017, मेरे साथ चलने का शुक्रिया,

मेरा हाथ पकड़ साथ देने का शुक्रिया,

छूटने वाला है साथ मगर,

बस थोड़ी ही रह गयी है डगर,

365 दिनों तलक साथ निभाने का शुक्रिया!

©®मधुमिता

Saturday, 30 December 2017

जज़्बात...




कोहरे की चादर के पीछे छिपा ये अलसाया सूरज

और रज़ाई के अंदर दुबके,अलसाये से तुम,

उठो उठो की मेरी पुकार,

रुको, रुको कहता तुम्हारा इन्कार,

प्याली में ठंडी होती चाय

और बर्फ पड़ रहे मेरे जज़्बात,

दोनों में ज़्यादा फ़र्क तो नही!

हाँ चाय की प्याली ज़रूर दुबारा गर्म हो जाती है

उस धात के चौरस डिब्बे मे 

बिजली की छोटी छोटी चुम्बकनुमा तरंगों से,

और रज़ाई के लिहाफ़ के अंदर छिप जाते हैं 

एक और सुबह का इंतज़ार करते,

मेरे जज़्बात!

©®मधुमिता

Sunday, 24 December 2017


शब्दों का स्पन्दन ...



लिखती हूँ पातियाँ कई
कविता करती हूँ हर दिन नई,
शब्दों को बुनती हूँ,
कुछ राग गूंथती हूँ,
गीत गुनगुनाती हूँ,
तुझको बुलाती हूँ,
साँझ- सवेरे,
इन अधरों पर मेरे,
नाम तेरा ही सजा रखा है,
वचनों को कुछ संजो रखा है, 
वादियों में तुझे ढूंढ़ती ,
तेरी खुशबू हवाओं में खोजती,
एक आस है,
निश्चय है, विश्वास है,
कि मेरी खोई सी आवाज़,
ये सुगम शब्दों का साज़,
तुझ तक तो पहुँचेगी कभी,
ज़रूर पा जाएँगीं तुझको कहीं,
खींच लायेगी मेरे शब्दों की डोर
तुमको इक दिन मेरी ओर,
मेरी आवाज़ हो,ना हो सही,
इन शब्दों का स्पन्दन ही सही !

©®मधुमिता

Thursday, 14 December 2017

कुछ आँसू 



कुछ आँसू ढुलक गये मुस्कुराते हुये,
एक मुस्कान तैर गयी रोते हुये,
खारी सी हर एक बूंद 
तेरी चटपटी यादोँ संग,
रस रंजित कर गयी 
मेरी सुन्न पड़ी ज़ुबान को,
सुप्त पड़े हृदय को
जगा गयी आमोद से,
सुखद से एक स्पर्श से
आह्लादित कर गयी 
हर रोम-रोम को,
जीवित कर गयी 
हर भाव, अनुराग को,
कर गये सचेतन
एक निर्जीव, निष्प्राण को,
ये कुछ आँसू जो ढुलक गये मुस्कुराते हुये।।

©®मधुमिता