कमरा भरा है,
पर आवाज़
कहीं नहीं।
तुम्हारी चीज़ें
अब भी वहीं हैं,
बस
उनका मतलब
खो गया है।
यादें पूरी नहीं आतीं,
टुकड़ों में गिरती हैं,
कभी तुम्हारा कंधा,
कभी अधूरी बात,
कभी वह शाम
जिसे हमने विदा ही नहीं कहा।
मैं सब कुछ याद नहीं करता,
बस
महसूस करता हूँ
कि कुछ छूटा है।
तुम्हारा नाम
अब शब्द नहीं रहा,
एक रुकावट है
मेरी साँसों के बीच।
खामोशी इतनी गहरी है
कि अगर तुम लौट भी आओ,
तो शायद
मैं पहचानने से पहले
चुप रह जाऊँ।
©®मधुमिता
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