Monday, 5 January 2026

असीम..

 मुझे ले चलो वहाँ

जहाँ तुम्हारा नाम

मेरी हर साँस में

पहली धड़कन बनकर उभरे।


सात समुंदर भी कम पड़ें

अगर तुम्हारी आँखों की गहराई नापनी हो,

तेरह नदियाँ भी थक जाएँ

अगर तुम्हारे स्पर्श तक पहुँचना हो।


नीले आकाश के नीचे

मैं अपने सारे डर उतार दूँ,

और तुम अपने कंधों पर

मेरा भरोसा पहन लो।


वहाँ ना कोई आईना होगा,

न कोई सवाल,

बस तुम्हारी हथेलियों में

मेरा पूरा भविष्य सिमटा होगा।


मैं तुम्हें यूँ चाहूँ

जैसे धरती बारिश को,

और तुम मुझे यूँ अपनाओ

जैसे रात चाँद को,

बिना शर्त,

बिना सीमा।


©®मधुमिता

तुम्हारी आँखों में

तुम्हारे पास आने में

किसी रास्ते की ज़रूरत नहीं,

तुम्हारी ख़ामोशी ही

मुझे बुला लेती है।


जब तुम पास होते हो

तो शब्द थक जाते हैं,

और मेरी साँसें

तुम्हारी लय सीख लेती हैं।


मैं तुम्हें छूती नहीं,

फिर भी

तुम मेरी धड़कनों में

पूरा उतर आते हो।


तुम्हारी आँखों में

मैं अपने अधूरेपन को

बिना झिझक छोड़ सकती हूँ,

मुझे कोई डर नही,

जैसे रात को

चाँद से डर नहीं लगता।


अगर कभी खो जाऊँ

तो मुझे आवाज़ मत देना,

बस पास बैठ जाना,

मैं तुम्हें

ख़ुद ढूँढ लूँगी।


©®मधुमिता

उदासी का साथ

 तुम्हारे होने की आदत

अब तुम्हारे ना होने से

और गहरी हो गई है।


मैं आज भी

तुम्हारे लिए

दो कप चाय बना लेता हूँ,

फिर याद आता है

एक कप हमेशा ठंडा रह जाता है।


तुम्हारी खामोशी

अब भी मुझे

सबसे ज़्यादा सुनाई देती है,

जैसे कोई अधूरा गीत

हर शाम खुद को दोहराता हो।


मैंने सीखा नहीं

तुम्हारे बिना मुस्कुराना,

बस निभा रहा हूँ

दिन का बोझ

रात की आँखों में।


अगर कभी लौटो

तो कुछ कहना मत,

बस बैठ जाना पास,

उदासी को भी

कभी-कभी

साथ की ज़रूरत होती है।


©®मधुमिता

अकेली यादें ..

 अब यादें

दरवाज़ा खटखटाती नहीं,

सीधे भीतर आकर

बैठ जाती हैं।


तुम्हारी हँसी

आज भी

कमरे का सबसे उजला कोना है,

बस वहाँ

अब कोई बैठता नहीं।


मैं रोज़

कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे,

फिर याद आता है कि

आवाज़ें

अब रास्ता भूल चुकी हैं।


तुम्हारा नाम

जब मन में आता है,

तो दिल

एक पल के लिए

रुक कर चलता है।


हम साथ थे,

यह याद नहीं दुखती,

दुखता है यह

कि अब हर याद

अकेली है।


अगर समय

थोड़ा नरम होता,

तो शायद

तुम्हें भूल नहीं,

बस

धीरे-धीरे

सह लेना सीख जाता।


©®मधुमिता

गर तुम लौट आओ..

 कमरा भरा है,

पर आवाज़

कहीं नहीं।


तुम्हारी चीज़ें

अब भी वहीं हैं,

बस

उनका मतलब

खो गया है।


यादें पूरी नहीं आतीं,

टुकड़ों में गिरती हैं,

कभी तुम्हारा कंधा,

कभी अधूरी बात,

कभी वह शाम

जिसे हमने विदा ही नहीं कहा।


मैं सब कुछ याद नहीं करता,

बस

महसूस करता हूँ

कि कुछ छूटा है।


तुम्हारा नाम

अब शब्द नहीं रहा,

एक रुकावट है

मेरी साँसों के बीच।


खामोशी इतनी गहरी है

कि अगर तुम लौट भी आओ,

तो शायद

मैं पहचानने से पहले

चुप रह जाऊँ।


©®मधुमिता

आगमन

तुम्हारे आगमन से ही

प्राणों में कोई राग उतर आता है,

जैसे शरद की पहली चाँदनी

नील गगन को चुपचाप भर जाती है।


तुम्हारी दृष्टि 

मौन में लिपटी हुई कथा-सी,

जो बिना कहे ही

हृदय के अर्थ खोल जाती है।


केशों में अटकी सुवास

ऋतु-सी मेरे पास ठहर जाती है,

और अधरों की कोमल रेखा

मन में नई भाषा रच जाती है।


पलकों के झुकने-उठने में

लज्जा का कोई दीप जलता है,

हर श्वास के संग

एक अनकहा स्वप्न पलता है।


निकटता का यह क्षण

न समय माँगता है, न शब्द,

बस दो मौन भावों का

एक-दूसरे में विलय हो जाना ही पर्याप्त है।


ऐसे में मैं और तुम नहीं रहते,

केवल एक अनुभूति शेष बचती है,

जो देह नहीं,

आत्मा की गहराइयों में स्पंदित होती है।


©®मधुमिता

दूरी

तुम्हारी दृष्टि की छाया में

मेरा हर पल सिहर जाता है,

तुम्हारी मौन मुस्कान से

हृदय का साज बज जाता है।


केशों से फिसलती चाँदनी

जब गालों को छू जाती है,

हर साँस मेरी अनजाने में

बस तुम्हें ही गुनगुनाती है।


पलकों के झुकते ही जैसे

सपनों का सावन छा जाए,

और अधरों की हल्की लाली

मन में बिजली-सी समा जाए।


निकट तुम्हारे होने भर से

सारी दुनिया धुँधली लगे,

दो धड़कनों के संगम में

हर दूरी पिघलती लगे।


©®मधुमिता