Monday, 5 January 2026

चलो ना

 सुनो, चलो ना मेरे संग,

रुई-से श्वेत बादलों के पार,

जहाँ कल-कल बहते झरने हैं,

और खिलते अरमान अपार।


जहाँ सपनों के कोमल फूल

हर क्षण मुस्काते रहते हैं,

और असंख्य एहसासों के दीप

मन-आँगन में जलते रहते हैं।


हर दीप-शिखा मिलती हुई,

हम दोनों-सी लिपट जाती है,

शर्माती, फिर चौंक उठती,

और धड़कन बन सिमट जाती है।

©®मधुमिता

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