सुनो, चलो ना मेरे संग,
रुई-से श्वेत बादलों के पार,
जहाँ कल-कल बहते झरने हैं,
और खिलते अरमान अपार।
जहाँ सपनों के कोमल फूल
हर क्षण मुस्काते रहते हैं,
और असंख्य एहसासों के दीप
मन-आँगन में जलते रहते हैं।
हर दीप-शिखा मिलती हुई,
हम दोनों-सी लिपट जाती है,
शर्माती, फिर चौंक उठती,
और धड़कन बन सिमट जाती है।
©®मधुमिता
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