Monday, 5 January 2026

उदासी का साथ

 तुम्हारे होने की आदत

अब तुम्हारे ना होने से

और गहरी हो गई है।


मैं आज भी

तुम्हारे लिए

दो कप चाय बना लेता हूँ,

फिर याद आता है

एक कप हमेशा ठंडा रह जाता है।


तुम्हारी खामोशी

अब भी मुझे

सबसे ज़्यादा सुनाई देती है,

जैसे कोई अधूरा गीत

हर शाम खुद को दोहराता हो।


मैंने सीखा नहीं

तुम्हारे बिना मुस्कुराना,

बस निभा रहा हूँ

दिन का बोझ

रात की आँखों में।


अगर कभी लौटो

तो कुछ कहना मत,

बस बैठ जाना पास,

उदासी को भी

कभी-कभी

साथ की ज़रूरत होती है।


©®मधुमिता

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