तुम्हारे आगमन से ही
प्राणों में कोई राग उतर आता है,
जैसे शरद की पहली चाँदनी
नील गगन को चुपचाप भर जाती है।
तुम्हारी दृष्टि
मौन में लिपटी हुई कथा-सी,
जो बिना कहे ही
हृदय के अर्थ खोल जाती है।
केशों में अटकी सुवास
ऋतु-सी मेरे पास ठहर जाती है,
और अधरों की कोमल रेखा
मन में नई भाषा रच जाती है।
पलकों के झुकने-उठने में
लज्जा का कोई दीप जलता है,
हर श्वास के संग
एक अनकहा स्वप्न पलता है।
निकटता का यह क्षण
न समय माँगता है, न शब्द,
बस दो मौन भावों का
एक-दूसरे में विलय हो जाना ही पर्याप्त है।
ऐसे में मैं और तुम नहीं रहते,
केवल एक अनुभूति शेष बचती है,
जो देह नहीं,
आत्मा की गहराइयों में स्पंदित होती है।
©®मधुमिता
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