Monday, 5 January 2026

अकेली यादें ..

 अब यादें

दरवाज़ा खटखटाती नहीं,

सीधे भीतर आकर

बैठ जाती हैं।


तुम्हारी हँसी

आज भी

कमरे का सबसे उजला कोना है,

बस वहाँ

अब कोई बैठता नहीं।


मैं रोज़

कुछ कहना चाहता हूँ तुमसे,

फिर याद आता है कि

आवाज़ें

अब रास्ता भूल चुकी हैं।


तुम्हारा नाम

जब मन में आता है,

तो दिल

एक पल के लिए

रुक कर चलता है।


हम साथ थे,

यह याद नहीं दुखती,

दुखता है यह

कि अब हर याद

अकेली है।


अगर समय

थोड़ा नरम होता,

तो शायद

तुम्हें भूल नहीं,

बस

धीरे-धीरे

सह लेना सीख जाता।


©®मधुमिता

No comments:

Post a Comment