Wednesday, 6 December 2017

चंदा रे...


चाहे चमचम चमको,
कितना भी दमको,
मुस्कुरा लो ,
कितना भी इतरा लो,
आज ना मुझ तक पहुँच पाओगे,
देखो रस्सियाँ हैं, फंस कर गिर जाओगे,
चलो जाओ अब ना करो बदमाशी,
करो ना यूँ तुम गुस्ताख़ी,
करो जाकर बादलों संग अठखेली,
सितारों के संग करो आँखमिचौली,
चलो जाओ अब तुम घर अपने,
छोड़ो मेरा आंगन, लेने दो मुझको मीठे सपने ।

©®मधुमिता

आस..




अदृश्य में तुझे तलाशती हूँ ,
तूझे ढूंढ़ने को अंधेरे बुहारती हूँ,
हवा के बोसों मे तेरे लबों की तपिश है,
सितारों के पीछे से झाँकतीं हुई तेरी नज़रे हैं।

पीले पन्नों में ज़ब्त तेरी यादों को सहलाती हूँ,
दिल में बसी तेरी सूरत को निहारती हूँ,
रोम रोम में बसी तेरी ही निशानियाँ हैं,
नसों में दौड़ती तेरे यादों की रानाईयाँ हैं।

निस्तब्ध में तेरे कदमों की आहट सुनती हूँ,
परदों के पीछे की हलचल में तूझे खोजती हूँ,
मेरे अस्तित्व के हर पोर पोर में तू है,
मेरे जीने का मकसद ही तू है।

इन फूलों और पत्तों में भी तुझे पाती हूँ,
नदियों के कलरव के साथ तेरे गीत गुनगुनाती हूँ,
इन नज़रों को बस तेरे छब की प्यास है,
इन साँसों को अब सिर्फ़ तेरे मिलने की आस है।।

©®मधुमिता
 

Friday, 1 December 2017

उम्मीद...


सूखे हुये पत्तों 
और इस सन्नाटे में
सुस्ता रही है एक उम्र,
 साथ है मेरी तन्हाई,
ठूंठों को सहलाती
जिला जाती कुछ साँसें,
चंद पन्नों में दर्ज़ 
कुछ मीठे से अल्फाज़
और ख़्वाबों से कुछ
यादगार लम्हात,
चाय के उस प्याले में
अभी तलक नक्श हैं
सुर्ख़ से दो लब,
जो लबों को मेरे छूकर
अहसास करा जाते हैं 
तेरी मौजूदगी का,
तुझे छूकर आती 
एक ताज़ी हवा का झोंका,
उम्मीदों से भर जाती है मुझे
और मेरी तन्हाई को।। 

©®मधुमिता

Wednesday, 29 November 2017

दुनिया का बाज़ार 





सुनहरी धूप और दुनिया का बाज़ार ,
सुनहरे जामो में कंक्रीट के अंबार,
कुछ घर और कुछ मकान,
कुछ एक सपनों की दुकान,
रिश्तों की ढेरीयाँ हैं,
मृषा की फेरीयाँ हैं,
कुछ सुख ,
अनगिनत दुःख,
कुछ नाते बिखरे से,
कुछ सम्बन्ध उखड़े से,
थोड़ी भीड़ है और थोड़ी तन्हाई,
मुहब्बत भी है देखो और है रुसवाई,
कुछ कहानियाँ हैं बनती हुईं
और कई बिगड़ती हुईं,
मुस्कुराते पल हैं,
नफरत भरे दिल भी हैं,
कटु सत्य भी,
मीठे मिथ्य भी,
रोशनी का यहाँ परदा है,
छुपा सा, कुछ अलहदा है,
आँख खोल, बिन लो और कर लो व्यापार,
सुनहरी धूप में सजा है दुनिया का बाज़ार।।

©®मधुमिता

 

Wednesday, 15 November 2017

मुहब्बत का सलीका 



सब कुछ भूलना ही शायद 
तुझे पाने का बेहतरीन तरीका है।

महसूस करने को तुझे
बस जी भर कर रो लेना है।

तेरी खुशबू है हवाओं में
इन हवाओं को बस थामना है।

तू यहीं है आसपास मेरे
तेरे अक्स को सीने में छिपा लेना है।

बार-हा लोग पूछे गर
तेरा नाम ज़ुबाँ पर ना लाना है।

ग़ैर मौजूदगी मे तेरी 
यादों से तेरे लिपट जाना है।

खुद को यूं खोकर भी
यादों मे तेरे बसना है।  

मै को मिटाकर
तुझ मे ही सिमटना है।
मुहब्बत से आगे निकल जाना ही शायद
मुहब्बत निभाने का सलीका है।


 ©®मधुमिता

Sunday, 12 November 2017

निस्तब्ध


बेजान सी,
अंजान सी,
सुधबुध खोई,
ना अपना, ना पराया कोई,
अदृश्य सी शांति है,
जीवन की भ्रांति है,
ना संचार,ना चाल,
थम गया मानो समय और काल,
अधखुली पलकों से झांकते कुछ पुराने दिन,
बंजर, सूखे से, खुशियों बिन,
दरस की प्यासी उस अनंत की,
सांसें डोर खींचती अंत की,
कुछ ढूंढ़ती,
कुछ खोजती,
आकुल
और व्याकुल,
कुछ छोड़ती सी,
सब कु खोती सी,
नि:शब्द,
निश्चेष्ट और निस्तब्ध।।


©®मधुमिता

Thursday, 26 October 2017

नारी



चंचल हूँ और स्थिर भी,
शांत पर अस्थिर भी,
अव्यस्त फिर भी निरंतर व्यस्त हूँ,
निर्भीक फिर भी हर पल त्रस्त हूँ,
विनीत और उद्धत भी,
परतंत्र पर स्वतंत्र भी,
संक्षेप हूँ, विस्तार हूँ,
सविकार और निर्विकार हूँ,
निर्बल हूँ ,
फिर भी सबल हूँ,
अपवित्र और पवित्र भी,
प्रलय और सृष्टि भी,
बंधन हूँ, मुक्ति भी,
यथार्थ और कल्पित भी,
कल हूँ, आज हूँ,
दिन हूँ, रात हूँ,
गगन भी मै, 
पृथ्वी भी मै, 
मै लघु हूँ,
मै गुरु हूँ,
गद्य मे मै, 
पद्य मे मै,
श्यामा हूँ,
दुर्गा हूँ,
मै आदि हूँ , 
मै ही अंत हूँ,
तृप्ति और तृष्णा हूँ,
सत्य और मृगतृष्णा भी,
खाली सी पर भरी हूँ मै,
हाँ! नारी हूँ मै ।।

©®मधुमिता