Tuesday, 16 August 2016

प्यार के निशान 




ये मखमली सा गुलाब का फूल,
नाज़ुक सा,अपने अंदर
मोती को छुपाये,
स्वर्णिम सी आभा लिये
इतराते हुये,
क्या इसे पता है कि इसका 
मखमल तुमसे ही है?
सारी नज़ाकत तुम्हारी,
गुलाबी से आवरण में 
तुम मेरे अंदर समाई हुई,
रेशमी,झीनी चादर 
में मेरे दिल को समेटे हुये,
अपने स्पन्दनों से
मेरे हृदय को रोज़ धङकाती तुम। 



ये हरे-हरे पत्ते,
चमचमाते, झिलमिलाते 
से,सूरज की किरणों तले,
क्या इन्हे पता है
कि तुम भी इनकी तरह,
हरी-भरी सी,चमकती सी,
मेरे दिल के अंदर नर्तन 
करती हो,गुनगुनाती हो?
लहलहाती हो हरे धान सी,
मेरे अंतर्मन में हरियाली करती,
खोजती मुझको,
मेरे ही छाती के अंदर,
अंदर तक अपनी जङें फैलाकर,
कोने-कोने,टटोलती तुम।


प्यार ही प्यार बिखरा है चारों ओर,
गाती हुई खामोशी पसरी है हर ओर,
बसंत ने अपने रंग बिखेर दिये हैं 
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारे लिये,
तितलियाँ रंग लिये मंडरा रही हैं,
रंगने तुम्हारे हसीन सपने,
सपने जो अंतहीन हैं, 
बिल्कुल हमारे प्रेम की तरह,
अनंत और हर पल जीवंत, 
इस नीले आसमान 
और रंगीन ज़मीन 
पर हर तरफ है हमारा नाम,
हमारे प्यार से ढका हुआ है
ये धरती और आकाश ।


एक दूसरे की बाँहों में, 
प्रेम आलिंगन में बद्ध हम,
तुम्हारा चेहरा मेरे सीने मेें 
छुपा हुआ,
मेरी बाहें तुम्हे समेटे हुए,
इस रेतीली,सुनहरी सी 
धरती पर लेट ,
मौसमों का आना-जाना 
देखते,इंतज़ार करना,
हर पल,हर क्षण के
बदलने का, कब फूल खिलेंगे
या पत्ते झङेंगे शाखों और लताओं से,
सर्द सी अलसाई दुपहरी में 
पतझङ को खेल करते देखा करते हम और तुम।  


खामोश सा मंज़र,
खामोश खङे दरख़्त,
खामोशी से लिपटी लतायें,
खामोश समन्दर,
चरचराती, फरफराती लपटों 
के साथ लहलहाती लाल आग, 
चटकती लकड़ियाँ,उनमें से 
निकलता,गहरा खामोश धुआँ,
सर्र-सर्र सरकती हवा
टकरा जाती खिङकी के शीशों से, 
भरभराकर खामोशी को चीरती 
हुई बर्फीली आवाज़ ,
अपने प्यार की धुन में बेसुध
खामोश बैठे हम। 
  

हमें यहीं बने रहना है,
क्योंकि ये हवा,ये मौसम,
पतझङ और बसंत, 
सब हमें यहीं ढूढ़ेगे,
आवाज़ लगायेंगे हमें,
पुकारेंगे हमारा नाम लेकर,
यही हमारा पता है,
हर पत्ते,हर फूल पे लिखा है
नाम मेरा और तुम्हारा, 
ये ज़मीं,आसमां,
जङें,पेङ,हवा,
आग,धङकन,स्पन्दन,
सब साक्ष्य हैं 
मेरे ,तुम्हारे प्यार के।


यही हमारा नीङ है,
हर ओर लहरों की भीङ है,
हर पतझङ के पत्ते पर नाम हमारा है,
हर हवा के झोंके में स्वर हमारा है,
बसंत का राग हम ही हैं, 
सुर्ख़ गर्म आग भी हम हैं,    
मेरे सीने में घर बनाये हुए तुम,
मै तुम्हारे सीने की गरमाईश में गुम,
मखमली तुम्हारे हाथों को थामे
समय की राह पर चलते,
तुम्हारे संग गाते,गुनगुनाते,
फूल सी तुमको बाँहों में उठाकर,
हम दो,शांत आग को दिल में बसाते,
अजेय प्यार के निशान बनाते।।

©मधुमिता

Saturday, 13 August 2016

उङान....



छोटी-छोटी हथेलियाँ, छोटी सी उँगलियाँ, बंद मुट्ठी, उसमें मेरी उँगली। गुलाबी सा छोटा सा बदन, बङी-बङी आँखें और तीखी सी नाक, पापा और दादी जैसी। ऐसे थे मेरे नन्हे -मुन्ने।बस एक के बाल थे लम्बे और काले और छोटे के सुनहरे और घुंघराले। बङा सनी और छोटा जोई।मेरे जिगर के टुकङे।

उनका रोना, सोना, उठना,खाना,पीना,मुस्कुराना सब एक चलचित्र की तरह आज आँखों के सामने से गुज़र गया।उनका पहला शब्द, पहला कदम, पहली बार गिरना, खूद अपने हाथों से खाना खाना,ज़िद करना कुछ भी तो नही भूली मैं।आज भी सब याद है। मानों वक्त अभी भी वहीं है और मै अपने बच्चों में मग्न।
उन दिनों पतिदेव काम में ज्यादा मसरूफ रहते थें । घर की,बाहर की, काम की, सासू माँ की और बच्चों की सारी ज़िम्मेदारी बस हमी पर।दो नटखट , बातूनी बच्चे जिनके पास दुनिया भर के तमाम सवाल होते और एक मै जो कभी हाँ-हूँ  कर और कभी पूरी तल्लीनता से जवाब देती हुई।ऐसे वक्त में फुल्लो ने मेरा बहुत साथ दिया । जी हाँ फुल्लो,घर के कामकाज में मेरा हाथ बंटाती, बच्चों का ध्यान रखती,उनकी सहेली, मेरे बच्चों की फुल्लो बुआ।बहुत ध्यान रखा उसने मेरे बच्चों का।खेलती,खाना खिलाती,बाल काढ़ती और बहुत कुछ ।

पूरा दिन काम के बाद थक जाती थी,पर इन बच्चों की बातें, नित नयी कारस्तानियाँ, हंसी सब थकान मिटा देती। पता ही नही चला कब एक-एक करके दोनों के स्कूल जाने की बारी आ गयी। होमवर्क, असाइनमेंट, खेलकूद, संगीत, नाटक इन सब चीजों के साथ जीवन कटने लगा। भागा दौङी थी, पर थी मज़ेदार। हर एक लम्हे,हर काम का लुत्फ उठाया मैने...फिर चाहे वो सुबह ज़बरदस्ती नींद से उठाना हो, काॅम्पिटीशन की तैयारियां हों या पी.टी.एम. में जाकर टीचर से शैतानी के किस्से सुनने।  

दोनों की अपनी अपनी खासियतें और खामियां थीं, उसके बावजूद पढ़ने में अच्छे, एक्स्ट्रा करिक्यूलर ऐक्टिविटी में भी बेहतर। सबसे बङी बात लोगों का दर्द समझने वाले। मैंने बहुत कम छोटे बच्चों को ऐसा करते पाया है।
दिन और रात पलक झपकाने के साथ ही मानों बीतने लगे। हम दोनों चाहते थे कि हमारे बच्चे खूब ऊँची ऊङान भरें। अच्छे इंसान बने। हम दोनों उनके पंख सशक्त करने में लग गये। मालूम ही ना पङा कब बच्चे किशोरावस्था को लांघकर जवानी की दहलीज़ पर खङे हो गये।

आज उनके पंख फङफङा रहे हैं । उङने को तैयार हैं ।ना जाने कब मेरा घोंसला छोङ ऊँची उङान भर लें ।आज दोनों अपने अपने जीवन में व्यस्त हो गयें हैं । आजकी प्रतिस्पर्धा की होङ में वे भी जुट गए हैं ।मै रह गई हूँ अकेली. ...कभी उनके पलंग पर लेट कर उनको अपने आसपास महसूस करती हूँ, कुछ वैसे ही जैसे बचपन में मुझसे लिपट कर दोनों लेटते थें और कहानियाँ सुनते-सुनाते सो जाते थे। कभी उनके पुराने खिलौनों में उनका बचपन ढूढ़ती हूँ ,तो कभी उनके पुराने छोटे-छोटे कपङों में उन्हें तलाशती हूँ ।कहानियों की पुरानी किताबों में उनके हाथों से लिखे शब्दों में उनके नर्म   हाथों को महसूस करती हूँ ।

थक कर जब दोनों चूर हो जाते हैं तो,अपनी गोदी में छुपा लेने को दिल करता है ।दोनों अपनी मंजिलों को पा लेने की जब बातें करते हैं, तब माँ का दिल मेरा कहता है-"बच्चों ज़रा धीरे -धीरे चलो", पर मूक मुस्कान से उनके जज़्बे को निहारती रह जाती हूँ । 

विह्वल हैं दोनों अपनी उङान भरने को,दूर आसमानों में कहीं अपनी मंज़िल पाने को। रोकना चाहती हूँ, माँ हूँ....कैसे जी पाऊँगी इन्हें अपने आसपास फुदकते हुए, खिलखिलाते हुए देखे बगैर ।पर ये तो उनमुक्त पंछी हैं, इन्हें पंख भी हमने दिये, पंखों को सशक्त किये,उङना भी सिखाया। फिर आज मन क्यों अधीर है? यही तो जग की रीत है शायद ।
जाओ मेरे बच्चों, भरो अपनी उङान, करलो मंज़िल को फतह।।

©मधुमिता

Tuesday, 9 August 2016

बरखा रानी


घिर-घिर आये मेघा लरज-लरज, 
घरङ-घरङ खूब गरज-गरज,
प्रेम की मानो करते अरज,
धरती से मिलने की है अद्भुत गरज।


रेशम सी धार चमकीली,
नाचती थिरकती अलबेली
सी,करती धरती से अठखेली, 
मानो बचपन की हमजोली ।


बूंदों के मोती,
हर पत्ते पर गिरती,
आगे पीछे हिलती डुलती,
फिर उनपर चिपक कर बैठी।


किया है स्नान आज फूलों ने,
खिल-खिल गयीं आज बूंदों से,
रेशम सी पंखुङी में
बंद कर कुछ मोती क्षण में ।


मीठी-मीठी बरखा की फ़ुहार, 
शीतल करती बूंदों की बौछार, 
पिऊ-पिऊ पपीहा करे पुकार, 
दूर गगन में गूंजे मेघ-मल्हार ।


प्यासी धरती की प्यास बुझाती, 
उसकी तङप मिटाती, 
नदियों में अमृत भर जाती,
निर्मलता चारों ओर फैलाती।


मुझको को भी नहला ये जाती,
हौले से बूंदें मुझे पुचकारती, 
बार-बार यूँ मुझे छेङ-छेङ जाती,
पिया मिलन की आस जगाती।


तन को दे जाती शीतलता,
पर सजन की याद में जिया है जलता,
पल-पल उसको याद है करता,
बादलों की गरज की तर्ज़ पर ये दिल है धङकता।


बरखा रानी क्यों बैरन तुम बन जाती?
मेरे दिल की जलन क्यों तुम ना मिटाती?
जब तुम धरती से मिलने आती 
क्यों मेरे पिया को भी ना साथ मे लाती?


फिर हम सब मिलकर मुस्काते,
मिलकर ही भीगते भीगाते, 
पानी की ठंडी धार ओढ़ते, 
बूंदों को हथेली में जोङते।


अबके जब तुम फिर से आओ,
घने,स्याह बादल भी लाओ,
सबकी जब तुम प्यास बुझाओ,
मेरी एक अरज सुनती जाओ,
मेरे प्रेम की पांति ले जाओ,
पिया को मेरे साथ लिवा लाओ।


नही तो अकेली मै तङपती रह जाऊँगी,
प्रेम-अग्नि में झुलस जाऊँगी, 
पिया-पिया करती रो पङूँगी,
बूंदों में तुम्हारी एक सार हो जाऊँगी।


मेरे अंत का लगेगा लांछन तुमपर,
चाहे तुम बरसो इधर उधर,
मेरी प्यास जो बुझाओ अगर,
तो मानूँ तुम्हे सहेली जीवनभर।। 
  

©मधुमिता

Monday, 1 August 2016

हमारी मूरत




ये अथाह सागर जानता था हमारा प्यार,
जानती थी ये भीगी सी, मख़मली बयार,
रेत, सीप और मोती,
लहरें, झाग,मछलियाँ बङी-छोटी, 
पत्थर,कंकङ और खड्डे,
पानी भरे वो मचलते गड्ढे,
सबको हमारा नाम पता था,
इश्क करना था अपना काम पता था।


इन्हीं फूलों, इन्हीं पत्तों के बीच कहीं 
अंकित है हमारा पहला चुम्बन अभी भी,
अनंत पवित्रता का प्रतीक,
बिल्कुल वैसे ही,ठीक
जैसे भौंरे की छुवन से 
कली फूल बनती जैसे,
वैसे ही दो लब हमारे,
जुङते प्यार के फूल खिलाने।


ऐसा फूल जो है चिरकालिक, 
प्यार सिर्फ जिसका मालिक,
हमारा प्यार मीठे झरने की तरह,
फूट रहा था हर जगह,
पत्तों की हरियाली में,
फूलों के जीवंत रंगों में, 
लहरों की शिखाओं में,
स्वर्णिम रेत की चमकार में।


हर दिन कई नये फूल खिलते,
साथ हमारे अधर जुङते,
एक दूसरे से लिपटे हम,
समय वहीं गया था थम,
हवाओं में बिखरी थी तुम्हारी खुशबू,
मेरी बाँहों में तुम,मेरी आबरू,
हर क्षण हमारा नाम गूंजता,
हाँ वहीं हमारा दिल था बसता।    


हमारे प्यार का बसंत,
रंगीन,जीवंत, अनंत,
दो धङकते दिल,
जो गये थे मिल, 
घूल गये थे हम एक दूजे में ,
लहू भी दौङ रहा था एक दूजे की धमनियों में,
मेरे सीने में सिमटा तुम्हारा चेहरा,
मेरे चेहरे पर तुम्हारे रेशमी,उङते बालों का सेहरा।


गर्मी,सरदी,बसंत,बहार,
ठंडी-ठंडी बारिश की फ़ुहार,
हर एक खुश था हमारे मिलन पर,
पंछी,तरु, प्राणी हर,
हर पत्ता, हर फूल इतरा रहा था,
प्रेम हमारे साक्ष्य जो भी बन रहा था,
एक दूसरे के प्यार में चूर,
हम दोनों के चर्चे थे मशहूर ।


मशहूर थे हम वीरानों में,
ऊँचे आसमानी उङानों में,
फूलों और पत्तियों में,
डालियों और जङों में,
हर जगह थी हमारी छाप,
लेती थी लहरों की थाप
नाम हमारा दिन और रात,
हवा भी करती बस हमारी ही बात ।    


एक दूसरे की बाँहों में सिमटे,
दो बदन आलिंगन में लिपटे, 
हृदय की धङकन का गीत,
रुमानी सा, गुलाबी संगीत, 
आसमान की चादर तले,
तारों की झालर तले,
एक हुये हम दोनों धीरे-धीरे,
चुपके से यूँ ही सागर के तीरे।


ऐसे ही तुम मुझमें सिमटी रहो,
मुझसे आलिंगनबद्ध रहो,
मेरी पलकें तुम्हारे गेसू संवारती,
लब मेरे करते प्रेम आरती,
सब कुछ प्रेम मय हो जाता,
समय का पहिया भी थम जाता,
तुम मुझे देखती,मै देखता तुम्हारी सूरत,
ऐसे ही काश बनी रहती,अजर,अमर हमारी मूरत।।

©मधुमिता 

Thursday, 28 July 2016

कर सको तो.....




किताबों के ज़र्द पन्नों के बीच

एक गुलाब आज भी रखा है,

जिसकी खुशबू आज भी

सिर्फ मेरे लिये है,

चुरा सको, तो चुरा लो!



लाईनों वाले पन्ने पर लिखा वो ख़त,

उसका एक-एक लफ्ज़ 

ज़िन्दा है आज भी, 

बस मेरे ही लिये, 

मिटा सको,तो मिटा दो!



सफेद चादर की सलवटों में

आज भी तेरी गरमाईश 

कुछ अंदर तक जज़्ब है,

हाँ मेरे लिये,

बर्फ कर सको,तो कर लो!



आज भी मेरे हाथों में हैं 

खूशबू तुम्हारे बदन की,

कितना भी तुम चाह लो,

चाहे मनुहार कर लो,

नही तोङ सकती तुमसे,

बंधन अपने तन और मन की।



हर तरफ तेरी यादें हैं, 

हर कोने में तेरे वादें, 

आँखों में तेरी सूरत,

मन मंदिर में तेरी मूरत,

मिटा ना सकेगा कोई कभी

ये छब मेरे यार की।



गुलाबी चुनरी मे

आज भी बंधे रखे 

हैं,कुछ तेरे मुस्कान,

जिला रहा है नर्म 

गुलाबी प्यार तेरा

जो बन गयी,अब मेरी जान।



अहसास तुम्हारी उंगलियों की

कराता अब भी,मेरे कानों की बाली का मोती,

चूङियों की खनखन करे

बातें हरदम बस तेरी,

पायल की झंकार 

भी बस,नाम तेरा ही ले बार-बार।




पुरानी तस्वीरें चमकने लगतीं

सूरज की रेशमी किरणों में,

आस की प्यास जगा जाती

हरजाई,दीदार को तेरे,

लहु का दौरा भी मेरा

पहुँच रहा दिल तक तेरे।



फूलों में भी रंग छिङके हैं 

देखो,हम दोनो के प्यार के,

तितलियाँ भी उङती फिरतीं,

हरियाली में तुझको ढुढ़ती, 

खुशबू के तेरे पीछा करती,

बदहवास सी भागती रहती।



रात के साये में 

तेरे सीने में शरमाकर मुँह छुपाना, 

तेरे सुलगते होठों का,मेरे माथे को चूमना,

आज भी सुलगा रहा है मुझे,

बुझा सको,तो बुझा दो!



रात के स्याह आँचल से ,

कुछ यादों के सितारे हैं बंधे,

चमचमाते,ठिठोली करते,

मेरे स्मृति की हमजोली ये,

तोङ सको,तो तोङ लो!



इन यादों में तुम ही तुम हो,

आँखों में बस, तुम बसे हो,

ये तन और मन कभी के हुये तुम्हारे,

ये हाथ भी कबसे थमाये, हाथों में तुम्हारे ,

दामन को मेरे तुम ,झटक सको,तो झटक दो!! 



©मधुमिता

Monday, 25 July 2016

सपनों का वो द्वीप 




हमारे सपनों का वो द्वीप, 
सागर के थपेड़ों के बीच,
स्वप्न जिसे रहे थे सींच,
भरे थे जिसमें मोती और सीप,
जलते थे जिस पर असंख्य दीप,
बजते रहते प्यार भरे मधुर से गीत।


वह पथरीला,हरा भरा सा टापू,
फैला जिसमें हरे काई का जादू,
कहीं मटमैली फिसलन,
कहीं गुलाबी जकङन, 
कहीं बदनों को सहलाती हवा,
कहीं दो धङकते दिल,जवां,
जैसे तुम्हारे अधरों से गीत निकलते
और चारों ओर गूंजते,
वहीं कहीं हरी सी काई रेंगती,
अपनी ही गंध में कौंधती,
मखमली कालीन सी लिपटी
उन सुंदर गुफाओं से, चिपटी
हुई, मानों जान हो उनकी,
निर्जीव पहाङी दीवारों में जान फूंकती।


वहीं एक नन्हे से दरार में, 
हवा के बयार में, 
वह रंगीन सा फूल जो डोल रहा था,
हमारी खुशियों में मस्त, इतरा रहा था,
जादुई उसकी बोली थी,
कुछ मूक शब्दों की टोली थी,
जो तुम्हारा नाम ले पुकारती,
फिरकी सी आती लहर जब बूंदों से उसे संवारती,
हर पेङ, हर दरख़्त हमें पहचानते,
हर पंछी,हर प्राणी वहाँ,हमें अपना जानते,
हर लता तुम्हारे हाथों को जाती थी चूम,
हर तरू साथ जताता झूम-झूम,
उस ऊँचे से पथरीली गुफ़ा में,
नाज़ुक से दिल, हमारे ही बसते थे।  


वह पथरीली,ऊँची सी दीवार,
मानों बंद करती हुई सारे द्वार,
बस एक मै और एक तुम,
सिर्फ दो हम,
पूरी दुनिया से हटे हुये,
हर जाने-अंजाने से कटे हुये, 
बस एक दूसरे में सिमटे,
दो दिल एक दूजे की आगोश में लिपटे,
तुम गीत मेरे सुनती,
मुझे अपने संगीत लहर में बहाती,
अंदर तक भिगो जाती,
उस पगली लहर सी जो पत्थर के सीने से टकराती,
टकराकर उसे नहला जाती,
अपनी शीतलता दे जाती।


मेरे गीत गाते मेरे प्यार का अफ़साना,
तेरे बारे मे चाहते हर एक को बताना,
चारों दिशाओं में फैला था बस प्यार,
इंद्रधनुषी सा ग़ुबार, 
जिसमें सिमट कर रह गयीं थी लहरें,
धरती, अम्बर, समय के काफिले, 
समुन्दर,वह टापू और सारे फूल,
काई,सैलाब,रेतीली धूल,
वह अधखुला सा बीज,
धरती की छाती के बीच
जो अपने अधर धर रहा था,
आसमान पर जो रूपहला बादल विचर रहा था,
सब हमारे प्यार की कहानी सुनाते थे,
हर पल हमें गुनगुनाते थे।


हर हवा हमें  पहचानती थी,
हर ऋतु हमें अपना मानती थीं,  
रेशमी फूलों ने हमें संवारा था,
तारों ने चमचमाता चादर ऊपर बिछाया था,
यहीं कहीं हमारा प्यार था पनपा,
हर क्षण के साथ था बढ़ता,
हमारा प्रेम बिखरा था रातों में,
सूरज के किरणों में,शर्मीली शामों में,
हवा भी कभी तुम्हारा,कभी मेरा नाम पुकारती,
लहरें भी हमें अठखेलियों को बुलाती,
फूल,फल, मिट्टी, पेङ,
शाखा, पत्ते,कली और जङ,
सब थे हमारे प्यार के साक्ष्य,
यहीं था हमारा छोटा सा साम्राज्य।


तुम्हारा नाम ले लेकर मेरे लब,
लेते तुम्हारे सूर्ख़ अधरों का चुम्बन जब,
तब समां भी सूर्ख़ हो जाता था,
वह सूर्ख़ गुलाब भी शरमा जाता, 
जिसकी हर पंखुङी पर नाम तेरा लिखा था मैने,
जिस तरह हर गुफा की दीवार पर मेरा नाम लिखा था तुमने,
साथ-साथ हम चलते चलें,
एक दूजे संग बढ़ते रहे,
ना कोई भेद,ना छुपा कोई राज़,
ज़िन्दगी के बोलों पर बजाते प्यार का साज़,
तुम मुझमें, मै तुम मे शामिल, 
दोनो बस मुहब्बत के कायल, 
दो दिल और जान एक हो चुके,
दोनों ही एक दूसरे के दिल में छुपे ।


हमारे सपनों का वो द्वीप, 
सागर के थपेड़ों के बीच,
स्वप्न जिसे रहे थे सींच,
भरे थे जिसमें मोती और सीप,
जलते थे जिस पर असंख्य दीप,
बजते रहते प्यार भरे मधुर से गीत।

©मधुमिता

Friday, 22 July 2016

छब तेरी



पथराई सी आँखें मेरी
ढूढ़ती है सिर्फ तुझको,
रूंधी सी आवाज़ भी 
अब,बुला रही बस तुझको,
मंद पङती धङकनों में 
अब भी बाकी है थाप तेरी,
साँसों की संगीत के
आरोह-अवरोह भी बस तू ही।


खामोशी भी अब शोर मचाती है,
झींगुरों के कलरव को दबाती है,
रात की स्याही तले,
टिमटिमाते से दो नयन मेरे,
तकते द्वार के परे,
मिलन की आस लिये,
जीवन की जीर्ण डोर को थामे,
यूँ ही कट रही मेरी सुबह और शामें ।


घूम आता है मेरा बावरा मन,
फिर-फिर धरती और गगन,
पाने को तेरी एक दरस,
प्यासी धरती सी,रही मै तरस,
सुनने को तेरी पदचाप, 
ले रही साँसें चुपचाप, 
कहीं तेरे कदम,बिन बोले गुज़र जायें,
मुझसे बिन बोले,बतियाए ।


शिथिल सा मेरा बदन,
हर पल मचलता मेरा मन,
तेरी झलक पाने को बस ये दिल धङक रहा है,
बेसब्री से इंतज़ार तेरा,मेरा रोम-रोम करता है,
सूखे से कुछ ख्वाब अभी भी लटक रहे हैं,
मद्धिम पङती साँसें, आस की जाली में अटक रहे हैं,
बंजर से इस मन को कब्रगाह बनने में कुछ ही देर है,
आस की डोरी के चटकने भर की देर है।


आजा कि अब पलकें भी लहुलुहान है,
पत्थर सी आँखों पर झपक-झपक हैरान है,
साँसें भी अब आस का दामन छोङने लगीं,
धङकनें भी अब सुस्त पङ,थके हुए डग भरने लगीं,
जमने लगा है कोशिकाओं में रुधिर,
अस्फुट से बोलों के बीच बंध गये हैं अधर,
अविरल सी धाराओं में बह रहा है मेरा प्यार,
रो-रो कर ये नयन और कितना करें इंतज़ार ।


अब रहम कर इस बुझती लौ पर,
एक हाथ बस अपना रख दे सर्द माथे पर,
संभलती नही हैं साँसें अब,
ना जाने ये साथ छोङ जायें कब,
बंद हो रही ज़ुबां मेरी,सूख गये हैं लब, 
जब मै ना रहूँगी,क्या आयेगा तू तब!
इससे पहले मैं अलविदा कह दूँ,आखिरी झलक दिखा जा,
बंद कर तुझे आँखों में ले जाऊँ मैं,अब तो छब दिखला जा ।।

©मधुमिता