Saturday, 18 August 2018

गंगा मयी...



सुलग रही थी मै,
धधक रही थी मै,
कुछ ज्वर से,
आवेश में,
ज्वार सी 
ऊफन रही थी,
विह्वल थी,
अज्ञान था,
सर्वज्ञान का भान था;
भागीरथी सम,
अलकनंदा, 
मंदाकिनी सी
कूदती-फांदती, 
हर बांध तोड़ 
भागी जा रही थी,
बेतहाशा,
बेकाबू..
कि उस किरण ने 
थाम लिया मुझको,
बोली, " ला दे दे",
" दे,अपनी उष्णता मुझको,"
"बाँट ले ये ओज मुझ संग",
और ढांप लिया 
मुझे अपने आँचल से,
जिस तल छिपी थी
असीम प्रकाशमयी गंगोत्री,
जो भिगो गयी मुझे,
संचारित कर गयी
नूतन चेतना,
दिखा गयी जीवन सारा,
समझा गयी जीवन सार,
उन्मादी उन्मुक्तता 
को लयबद्ध कर गयी,
अग्नि थी अब भी,
पर दावानल की ज्वाला नही,
मै शांत हो गयी,
शीतल हो गयी,
जीवन ज्ञान से 
लदी फदी,
बह चली थी मै,
मै, अब गंगा हो गयी थी ।।

©®मधुमिता

 

Thursday, 9 August 2018

अब जाने दो....


चलो ना! अब जाने दो!
क्यों टाँकती हो इन रंग-बिरंगी कतरनों को
इस तार तार होती रिश्तों की चादर पर?
हाँ, ये दूर से लगती तो बेहद खूबसूरत है,
और फिर तुम्हारी कारीगरी भी तो गज़ब है
जो इन महीन और नाज़ुक धागों से इनको 
बेइंतहा मुहब्बत से सीती हो !
दिल से जोड़कर रखती हो!
पर इनसे भान होता है, इनके एक सार ना होने का,
अहसास होता है एक टूटन का, 
हर पैबंद ढांक रहा है एक गर्त को,
जिनमें बसे हैं असंख्य भंवर,
झंझावत और चक्रावात ,
जो तैयार हैं तुमको सोखने को, एक अनंत, अदृश्य में,
आत्मसात करने को चिरकालिक अंधकार में,
बस एक टाँके के चटकने भर की दरकार है !
कोई मायने नहीं अब इसे संभालने की, 
लाख कोशिशें कर लो, अब ये ना संभलने की,
हर पैबंद एक चोट है,
सुंदर सी पट्टी के पीछे, रिसती हुई;
चलो ना, कुछ नये धागे बिन लायें,
एक नई रंगीन चादर बुन डालें,
सजायें नये रंगों से,
नये सपनों से, 
मैली बेहद है ये
बेकद्र भी बहुत,
अब इसको ना रोको,
वक्त के सलवटों में चलो
इसको अब दफ़ना दो,
चलो ना! अब जाने दो!        

©®मधुमिता

Wednesday, 2 May 2018

बसंत...


छंट गया भीषण अंधियारा
प्रकाशमय हो गया अम्बर,
सर्द हवा के चादर के बीच
झांक रहा उजला सूरज!
दृश्य सजे हैं अनगिनत,
चहुँ ओर है मधुरम सुगंध,
नव किसलय हैं,
नूतन कलियाँ, 
भवरों का गुनगुन,
चहकती हुई
पंछियों की धुन,
रस लहरी है, 
है रंगों की झड़ी,
उत्साह है, उल्लास है,
अनंत आनंद का आभास है,
प्रेम-प्यार की है बयार,
राग-अनुराग की 
हर पल बहती धार,
गुलाबी सी मदहोशी है,
बासंती रागिनी, 
स्वर्णिम से सपने,
स्वप्निल सा मौसम,
सपनों में बसंत है कोई,
या बसंत में कोई सपना !

©®मधुमिता


Friday, 13 April 2018

मदारी...


जमूरे!
बोलो मदारी!
खेल दिखायेगा?
दुनिया को नचायेगा?
पर कैसा खेल
और कौन सा नाच?
वही जो तुझे सिखाया है,
इतने बरसों से बताया है!
पर मै कैसे सबको नचाऊँगा?
सबकी जीवन डोर को कैसे घुमाऊँगा?
ये दुनिया तो खुद ही सरपट भागती है,
बेतहाशा यूँ ही नाचती है,
अनदेखी सी डोर से बंधी,
कभी उठती, कभी बैठती,
बताओ तो ज़रा, किसने थामी है उनकी डोर?
सबकी डोर है उसके हाथ,
वही जो देता है सबका साथ,
नचाता है, 
बिठाता है,
हँसाता है,
रुलाता है,
वही तो है सबसे बड़ा मदारी!
रचा हुआ सब उसका सारा,
सृष्टि, सृष्टा सब वही है,
उसी की बिसात बिछी है,
चल उठ अब, खेल दिखाते हैं,
दुनिया को नचाते हैं,
सब उसी का खेला जान,
उसी की मरज़ी मान,
क्यों जमूरा!
हाँ मदारी।
 
 ©®मधुमिता 


 

Friday, 6 April 2018

रात...

सलेटी मख़मल सा ये आसमां,

बहुत अकेला है देखो!

ना तो चंदा का साथ है,

ना चाँदनी की चिलमन,

ना कोई रात का परिंदा है

और ना ही कोई पतंगा,

मोम सी पिघल रही है रोशनी शमा की

सहर के इंतज़ार में,

हर लम्हे की साँसों को सुन लो,

दस्तक जो देतीं वक़्त के दरवाज़े पर,

ख़ामोशी को सुनो,

छुपी हुई है वो इस शब के सलवटों में,

ख़ौफ़ है उसे इस अंधेरे से

गुम हो रही है जिसमें हर उजली सी उम्मीद,

देखो! आज रात स्याह बहुत है,

कुछ सितारे तुम सजा क्यों नही देते!

©®मधुमिता

Sunday, 18 March 2018

कहो तो तुम क्या हो!



रेशम सा सहला जाते हो,
ठंडी हवा सा सिहरा जाते हो,
इत्र की महक हो!
हो शहद की मिठास!
कुछ तीखे से,
कुछ नमकीन,
बारिश की बूंदों सा
भिगो जाते हो,
मनचले बादल सा
फिर फिर उड़ आते हो,
खुली आँखों से देखा ख़्वाब हो,
सवाल कभी, तो कभी जवाब हो,
उलझन हो,
सुकून हो,
साँस हो,
आस हो,
हर पल रहते आसपास हो!
कौन हो?
क्या हो?
एक अहसास हो महज़,
या कोई सच हो?
कहो तो तुम क्या हो!

©®मधुमिता 

Saturday, 3 March 2018

सूरज....



अलसाई नज़रों से जब देखा किये हम
तो एक अलसाई सी मुस्कान लिये
शरारती सी सुबह ने हमे सलाम किया,
जवाब में मुस्कुराये ही थे 
कि बादलों की ओट से झाँकते दिखे ये ,
हौले से हमें अपनी रोशनी में समेटने लगे,
उनकी सुनहरी किरणें थिरकने लगी
जिस्म पर हमारी, मचलने लगी रोम रोम में ..
कसमसा कर हमने रज़ाई और कस ली,
बस अधखुली सी नज़रों से जब देखा उन्हे,
तो बड़ी रौब में इतरा रहे थे वो,
कभी सामने आ जाते, 
कभी बादलों में गुम हो जाते,
खेल रहे थे हम संग, आँखमिचौली,
करते हुये कई अठखेली,
अम्मा! क्यों नही कहती आप इनसे कुछ!
कहिये कहीं और जाकर इतरायें,
किसी और पर अपना जादू चलायें,
बदमाशी पर जो हम उतर आयें 
तो हथेलियों में बंदकर 
उतार लायेंगे आसमान से
और कैद कर लेंगे अपने कमरे के फानूस में,
फिर हमसे मत कहियेगा छोड़ने को
इस मग़रूर और आशिकाना 
बदमाश से सूरज को! 
  
©®मधुमिता